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🌷| जन्म- मृत्यु | सुख - दुःख | 🌷
🌷मनुष्य जीवन हो या पशु-पक्षियों का जीवन, सभी का जीवन, जीवन व मृत्यु के पाश में बन्धा व फंसा हुआ है। कोई भी मनुष्य या प्राणी स्वेच्छा से मरना नहीं चाहता है कि वह सदा इसी प्रकार से बना रहे। उसे कभी कोई रोग न हो। दुःखों को कोई भी प्राणी पसन्द नहीं करता। परन्तु फिर भी जीवन में वृद्धि व ह्रास तथा सुख व दुःख सहित जन्म-मृत्यु का चक्र चलता रहता है। हम देखते हैं कि हमारे परिवार व हमारे निकटवर्ती अन्य भी जो लोग हमसे आयु में बड़े थे, वह हमारे सामने कुछ कुछ अन्तराल के बाद दिवंगत होते रहे। कोई रोगी होकर मृत्यु को प्राप्त होता है तो कोई अचानक हृदयाघात आदि से मर जाता है। मृत्यु के अनेक कारण हो सकते हैं। अतः जीवन व मृत्यु को जानना हम सबके लिए आवश्यक है जिससे हम जीवन-मृत्यु विषयक सत्य स्थिति को जानकर अन्यों की अपेक्षा कम दुःखी हों या हो सके तो योग व ध्यान में प्रवृत्त होकर मृत्यु पर विजय प्राप्त कर लें जिससे हमारा यह जीवन मृत्यु के डर के साये में न बीते और हम भय मुक्त व प्रसन्न रहते हुए प्रतिदिन व हर पल सुख व शान्ति से अपना समय सार्थक व रचनात्मक कार्यों को करते हुए व्यतीत करें।
जीवन और मृत्यु को जानने के लिए हमें ईश्वर व जीवात्मा के अस्तित्व व स्वरूप को भी जानना आवश्यक है। ईश्वर सच्चिदानन्दस्वरूप है। वह अनादि, नित्य और अनन्त है। ईश्वर निराकार, सर्वव्यापक, सर्वज्ञ, सर्वशक्तिमान, न्यायकारी, दयालु, अजन्मा, अनन्त, निर्विकार, अनुपम, सर्वाधार, सर्वेश्वर, सर्वान्तर्यामी, अजर, अमर, अभय, पवित्र और सृष्टिकर्ता है। ईश्वर के अतिरिक्त इस संसार में जीवात्मा और प्रकृति का भी अस्तित्व है। जीवात्मा भी चेतन तत्व व पदार्थ है। यह भी अनादि, नित्य, अमर, अनन्त व एकदेशी है। जीवात्मा अल्पज्ञ और ससीम है। अनन्त का अर्थ है कि जिसका अन्त कभी नहीं होता। हम मनुष्य व इतर प्राणियों की मृत्यु को होता देखते हैं। यह मृत्यु शरीर की होती है। इस शरीर में विद्यमान चेतन जीवात्मा कभी मरता नहीं अपितु ईश्वर की प्रेरणा से पूर्व शरीर से निकल कर अपने कर्मानुसार अपने भावी माता-पिताओं के पास चला जाता है और वहां ईश्वरीय व्यवस्था से उनके शरीरों में प्रवेश कर ईश्वर द्वारा बनाये नियम के अनुसार जन्म लेता है। यह जीवात्मा अत्यन्त सूक्ष्म होता है।
यदि ईश्वर, जीव व प्रकृति की सूक्ष्मता पर विचार करें तो जीवात्मा से सूक्ष्म ईश्वर है और जीवात्मा प्रकृति से भी सूक्ष्म है। यद्यपि प्रकृति भी अत्यन्त सूक्ष्म है परन्तु जीवात्मा सत्व, रज व तम गुणों वाली मूल प्रकृति के सूक्ष्म कणों से भी अधिक सूक्ष्म है। जीवात्मा संख्या में असंख्य व अनन्त हैं। इन जीवों ने अपने पूर्व जन्मों में जो कर्म किये होते हैं उनके आधार पर ईश्वर इन्हें उन कर्मों का सुख व दुःख रूपी फल देने के लिए मनुष्यादि नाना प्रकार की योनियों में से किसी एक में जन्म देता है। ईश्वर न्यायकारी व दयालु है। वह किसी के साथ पक्षपात नहीं करता। पक्षपात तभी किया जाता है कि जब निजी स्वार्थ, इच्छा व दूसरे से कोई अपेक्षा हो। ईश्वर में यह बातें नहीं है। वह जीवों को सुख देना चाहता है परन्तु इसके लिए तर्क व न्यायपूर्ण व्यवस्था यह है कि जीव के कर्म अच्छे वा शुभ हों। जिन्होंने शुभ कर्म किये होते हैं वह सुख पाते हैं और जिनके सभी व अधिकांश कर्म अच्छे नहीं होते हैं उन्हें निम्न वा नीच योनियों में जाना होता है जहां उन्हें दुःख प्राप्त होता है। इस दुःख का अभिप्राय भी जीवों को उनके कर्मों के फल भुगाकर उनका सुधार कर उन्हें मनुष्य योनि में उन्नत करना होता है।
अन्य योनि के जीवों को देख कर तथा वेद व सत्यार्थप्रकाश आदि ग्रन्थों को पढ़कर मनुष्यों को भी यह सीख व शिक्षा मिलती है कि वह भी अच्छे कर्म करें जिससे उन्हें इस जन्म व परजन्म में नीच योनियों में जन्म लेकर दुःख न भोगना पड़ें। यह भी जान लें कि प्रकृति जड़ है जिसमें कोई संवेदना या सुख, दुःख की अनुभूति नहीं होती। यह सृष्टि मूल प्रकृति से सर्गारम्भ पर ईश्वर के द्वारा बनाई जाती है और ईश्वर का एक दिन पूरा होने पर इसकी प्रलय हो जाती है। प्रलय का अर्थ होता है कि सूर्य, पृथिवी व चन्द्र आदि नष्ट होकर अपने कारण, मूल प्रकृति में विलीन हो जाते हैं।
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💐🙏आज का वेद मंत्र 💐🙏
🌷ओ३म् येभ्यो माता मधुमत्पिन्वते पय: पीयूषं: द्यौरदितिरद्रिबर्हा:।उक्थशुष्मान् वृषभरान्त्स्वप्नसस्ताँ आदित्याँ अनुमदा स्वस्तये। ( ऋग्वेद १०|६३|३)
💐अर्थ :- जिन विद्वानों के लिए प्रकाशवाली मेध सदृश दानशीलता, अखण्ड वेद विद्या वा पृथ्वी माता अति मधुर अमृत और दुग्धादि को देतीं हैं, ये अत्यन्त बल वाले श्रेष्ठों का पोषण करने हारे, सुकर्मी, अखण्ड व्रत वाले आदित्य ब्रह्मचारी हमारा मंगल करने वाले हो।
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